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शकुन्तला / अध्याय 14 / भाग 2 / दामोदर लालदास

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ऋषि-महर्षिक, ज्योतिषिक की कथन मिथ्ये हैत?
चक्रवर्त्ति-सुपुत्रकेर की प्राप्ति निष्फल जैत?
गर्भ-शिशु लय प्रियतमा आइलि छली एहि ठास!
हाय! तनिकहु देल हम बड़-बड विपति-परिणाम।।

जाहि मानस-चोटसँ उडि़ चललि से आकाश!
पुत्र दर्शन भेल दुर्लभ! भेल वंशक नाश।।
कतेक दुर्गति, विपति विधि लिखलनि ! पड़य नहिं जानि।
कोन पापक भेल ई परिणाम वंशक हानि!

अस्तु, निज मानसिक वेदनसँ नुपति मुख मोडि़।
मंत्रिहिक प्रतिवेदन विचार-चिन्ता छोडि़।।
देल नृप आदेश-कय दिअ घोषणा तत्काल।
वंशहीनक हमहिं सुत, पितु, पतिहुँ रक्षापाल।।

क्यो न हहरौ, क्यो न कुहरौ, न विभव नहि नृप लेत।
सम्पत्तिक रक्षार्थ भुपहि अपन तन-मन देत।।
हमहि अभिभावक जखन, धन ककर के हरि लेत।
तस्करो धन-लोभ कय नहि प्राण क्यो निज देत!

नृपक ई करुणा भरल सुनि घोषणा आदेश।
हँटल वंशविहीन सम्पतिवान केर सभ क्लेश।।
राज्य भरिये भेल वसुधाधीश-जयजयकार।
नृपहुँकें सदया करथु हरि दान वंशाधार।।