भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

शरशय्या / तेसर सर्ग / भाग 4 / बुद्धिधारी सिंह 'रमाकर'

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

कर्त्तव्यक पालन करु नृपवर!
प्रजा हितक दए कान।
पाप थीक नहि करब अधीनक
रक्षा पोषण ध्यान।।13।।

जनपूजा थिक सभसँ उत्तम
काज अहाँ धु्रब जानु।।
हिमकन्दरमे वैसव तजिकें
ई नहि कहिओ मानु“।।14।।

एहि विधि गप्पक क्रम छल चलइत
तावत नभसं श्याम।
उतरल श्रीक प्रभासँ मण्डित
तेज एक अनुपाम।।15।।

रूप देखि पुलकित मन सज्जन
पूरित जानल काम।
अएला अरुण-चरण मधुसूदन
भक्तविभव घनश्याम।।16।।