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शरशय्या / पहिल सर्ग / भाग 7 / बुद्धिधारी सिंह 'रमाकर'

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इन्द्रप्रस्थनायक नित टहलथि
सुन्दर-सलिला सरिता-तीर।
लखि तरंग हो मुदित हुनक मन
उठए कल्पना देखितहिं नीर।।31।।

देखल सहसा एक सुन्दरी
खेबि रहल तरणी जलबीच।
प्रथम दृश्य मन्मथक रागमे
जानि सकए नहि ऊपर नीच।।32।।

भेल विवश मानस छल हुनकर
रोकि न सकला गति उद्भ्रान्त।
पुछलन्हि, ‘‘अहाँ थिकहुँ के मानिनि!
कहु करु हमरो मनके शान्त’’।।33।।

रमणी बाजलि-‘‘धीवरराजक
पोसलि पुत्री छी हमद ेव!
असित मुनिक छी औरस तनया
परिचय अधिक अपन की देव’’।।34।।

आबि तटहिं ओ चललि अपन गृह
पछुओलन्हि उत्सुक पुरुराज।
छल उद्यत हुनकापर तनने
धनुषवाण लए मन्मथराज।।35।।

पहुँचि धीवरक लगमे कएलन्हि
प्रिया-याचना सहसा बाजि।
छल आहत जे भेल अचानक
परखि हुनक मन शोभा राजि।।36।।