निवेदन / शरद कोकास

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यज्ञकुंड की गहराईयों में
राख हो गई हैं ज्ञान की चिनगारियाँ
संजीवनी के पहाड़ों पर
उग आई हैं
ज़हरीली बूटियाँ
बिचौलिये लेकर भाग गए हैं
विश्वासों के अमृत कलश

सम्भव नहीं है अब
आस्था की लाश
अपने कन्धों पर उठाए भटकना

हमारे दुखों पर भभूत लगाने वालों से
प्रार्थना है
जुलूस क लम्बाई बढ़ाने के लिए
हमारा उपयोग न करें

जिनकी अपनी परिभाषा है
पुण्य की
आग अमृत और संजीवनी की
खुशियों के कई कुम्भ
जिनकी योजनाओं में है
उनसे हमारा निवेदन है
हमारे दुखों में
झूठी भागीदारी दर्ज़ ना करें

हमें खुद ढूँढ़ने दें
आस्थाओं के मरघट से
बाहर निकलने का रास्ता।

-1996

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