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वाएजा मस्जिद से अब जाते हैं मयख़ाने को हम / नासिख़

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वाएजा मस्जिद से अब जाते हैं मयख़ाने को हम
फेंक कर ज़रफ़े-वज़ू लेते हैं पैमाने को हम।

क्या मगस बैठे भला उस शोला-रु के जिस्म पर
अपने दाग़ों से जला देते हैं परवाने को हम।

तेरे आगे कहते हैं गुल खोलकर वाज़ू-ए-बर्ग
गुलशने-आलम से हैं तैयार, उड़ जाने को हम।

कौन करता है बुतों के आगे सजदा, ज़ाहेदा!
सर को दे दे मार कर, तोड़ेंगे बुतख़ाने को हम।

जन ग़िज़ालों के नज़र आ जाते हैं चश्मे-सिहाह
दश्त में करते हैं याद सियाहख़ाने को हम!

बोसा-ए-ख़ाले-ज़नख़दा से शिफ़ा होगी हमें
क्या करेंगे, ऎ तबीब इस तेरे बिहदाने को हम।

बांधते हैं अपने दिल में ज़ुल्फ़े-जानाँ का ख्याल
इस तरह ज़ंजीर पहनाते हैं दीवाने को हम।

पंजा-ए-वहशत से होता है गरेबाँ तार-तार
देखते हैं काकुले-जना में जब शाने को हम।

अक्ल खो दी थी, जो ऎ ’नासिख़’ जूनूने-इश्क़ ने
आश्ना समझा किए इक-उम्र बेगाने को हम।

शब्दार्थ :
वाएजा = हे उपदेशक
ज़रफ़े-वज़ू = वज़ू करने का बर्तन
मगस = मक्खी
शोला रु = आग जैसे मुँह वाली यानी प्रेमिका
वाज़ू-ए-बर्ग = पंखुड़ी के पंख
गुलशने-आलम = संसार रूपी बगीचा
बुतों = यहाँ मतलब प्रेमिका से है
ज़ाहेदा = ऎ सदाचारी
ग़िज़ाला = हिरण या मृग यानी प्रेमिका
चश्मे-सिहाह = काली आँखें
दश्त = मैदान
सियाहख़ाने = अभागा घर
बोसा-ए-खाले-ज़नख़दा = के तिल को चूमने
शिफ़ा = स्वस्थ होना
ऎ तबीब = ए डाक्टर
बिहदाना = शरीफ़ा नामक फल
ज़ुल्फ़े-जानाँ = प्रेमिका के बाल
काकुले-जनाँ = प्रेमिका के बाल
शाने = कंधा
आश्ना =मित्र
इक-उम्र = बहुत समय तक