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पूर्वानुमान / सिद्धेश्वर सिंह

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लरजता है वही एक स्वर
जिसे सुनता हूँ
दिन भर - रात भर ।

छँट रहा है कुहासा
लुप्त हो रही है धुन्ध
इधर-उधर
उड़-उड़ कर ।

मैं कोई मौसम विज्ञानी तो नहीं
पर सुन लो --
आज के दिन
कल से ज़्यादा गुनगुना होगा
धूप का असर ।