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11:45, 14 जनवरी 2011 के समय का अवतरण
मेघ नट हैं,
नटी बिजली
व्योम की है नाट्यशाला।
कभी गर्जन-कभी तर्जन-कभी वर्जन
कभी मोहन-मंत्र मारण-
हृदय हारण-रूप धारण
कभी नर्तन
कभी मंगल-वरण-वारण
कभी होता तम-
कभी होता उजाला।
दृश्य-अंतर्दृश्य सब मैं देखता हूँ,
वारि-वर्षण में प्रहर्षित भीगता हूँ
चर-अचर के साथ मैं भी
पी रहा कादम्ब-हाला
जी रहा मैं प्रकृत जीवन
द्वन्द्व का निर्द्वन्द्व जीवन
क्या अचेतन?
क्या प्रचेतन?
क्या विवेचन?
प्राण में सब प्राणमय है,
यही मेरी जय-विजय है
रचनाकाल: १३-०४-१९७६, मद्रास