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"गुज़रे दिनों की याद बरसती घटा लगे / क़तील" के अवतरणों में अंतर

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गुज़रे दिनों की याद बरसती घटा लगे
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गुज़रूँ जो उस गली से तो ठंडी हवा लगे
  
गुज़रे दिनों की याद बरसती घटा लगे<br>
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मेहमान बन के आये किसी रोज़ अगर वो शख़्स
गुज़रूँ जो उस गली से तो ठंडी हवा लगे<br><br>
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उस रोज़ बिन सजाये मेरा घर सजा लगे
  
मेहमान बन के आये किसी रोज़ अगर वो शख़्स<br>
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मैं इस लिये मनाता नहीं वस्ल की ख़ुशी
उस रोज़ बिन सजाये मेरा घर सजा लगे<br><br>
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मेरे रक़ीब की न मुझे बददुआ लगे
  
मैं इस लिये मनाता नहीं वस्ल की ख़ुशी<br>
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वो क़हत दोस्ती का पड़ा है कि इन दिनों
मेरे रक़ीब की न मुझे बददुआ लगे<br><br>
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जो मुस्कुरा के बात करे आश्ना लगे
  
वो क़हत दोस्ती का पड़ा है कि इन दिनों<br>
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तर्क-ए-वफ़ा के बाद ये उस की अदा "क़तील"
जो मुस्कुरा के बात करे आश्ना लगे<br><br>
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मुझको सताये कोई तो उस को बुरा लगे
 
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तर्क-ए-वफ़ा के बाद ये उस की अदा "क़तील"<br>
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मुझको सताये कोई तो उस को बुरा लगे<br><br>
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17:42, 30 नवम्बर 2011 का अवतरण

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गुज़रे दिनों की याद बरसती घटा लगे
गुज़रूँ जो उस गली से तो ठंडी हवा लगे

मेहमान बन के आये किसी रोज़ अगर वो शख़्स
उस रोज़ बिन सजाये मेरा घर सजा लगे

मैं इस लिये मनाता नहीं वस्ल की ख़ुशी
मेरे रक़ीब की न मुझे बददुआ लगे

वो क़हत दोस्ती का पड़ा है कि इन दिनों
जो मुस्कुरा के बात करे आश्ना लगे

तर्क-ए-वफ़ा के बाद ये उस की अदा "क़तील"
मुझको सताये कोई तो उस को बुरा लगे