भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
"गुज़रे दिनों की याद बरसती घटा लगे / क़तील" के अवतरणों में अंतर
Kavita Kosh से
Pratishtha (चर्चा | योगदान) |
|||
पंक्ति 2: | पंक्ति 2: | ||
{{KKRachna | {{KKRachna | ||
|रचनाकार=क़तील शिफ़ाई | |रचनाकार=क़तील शिफ़ाई | ||
− | }}{{KKVID|v=U36NWf90vuM}} | + | }} |
− | + | {{KKVID|v=U36NWf90vuM}} | |
+ | {{KKCatGhazal}} | ||
+ | <poem> | ||
+ | गुज़रे दिनों की याद बरसती घटा लगे | ||
+ | गुज़रूँ जो उस गली से तो ठंडी हवा लगे | ||
− | + | मेहमान बन के आये किसी रोज़ अगर वो शख़्स | |
− | + | उस रोज़ बिन सजाये मेरा घर सजा लगे | |
− | + | मैं इस लिये मनाता नहीं वस्ल की ख़ुशी | |
− | + | मेरे रक़ीब की न मुझे बददुआ लगे | |
− | + | वो क़हत दोस्ती का पड़ा है कि इन दिनों | |
− | + | जो मुस्कुरा के बात करे आश्ना लगे | |
− | + | तर्क-ए-वफ़ा के बाद ये उस की अदा "क़तील" | |
− | + | मुझको सताये कोई तो उस को बुरा लगे | |
− | + | <poem> | |
− | तर्क-ए-वफ़ा के बाद ये उस की अदा "क़तील" | + | |
− | मुझको सताये कोई तो उस को बुरा लगे< | + |
17:42, 30 नवम्बर 2011 का अवतरण
यदि इस वीडियो के साथ कोई समस्या है तो
कृपया kavitakosh AT gmail.com पर सूचना दें
कृपया kavitakosh AT gmail.com पर सूचना दें
गुज़रे दिनों की याद बरसती घटा लगे
गुज़रूँ जो उस गली से तो ठंडी हवा लगे
मेहमान बन के आये किसी रोज़ अगर वो शख़्स
उस रोज़ बिन सजाये मेरा घर सजा लगे
मैं इस लिये मनाता नहीं वस्ल की ख़ुशी
मेरे रक़ीब की न मुझे बददुआ लगे
वो क़हत दोस्ती का पड़ा है कि इन दिनों
जो मुस्कुरा के बात करे आश्ना लगे
तर्क-ए-वफ़ा के बाद ये उस की अदा "क़तील"
मुझको सताये कोई तो उस को बुरा लगे