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<poem>
134
कँटीली राहें
पथरीली चढ़ाई
हाथ थामना !
235
'''खड़े हैं लाखों'''
रक्तपायी पथ में
बचके चलो !
336
शंकित दृष्टि
बींधती तन-मन
दग्ध जीवन !
437
भाग्य का लेखा
भला करके भी तो
सुख न देखा !
538
तुम्हारी आँखें-
आँसू का समन्दर
पीना मैं चाहूँ।
639
पोंछ लो आँखें
सीने में छुप जाओ
क्रूर हैं घेरे ।
740
यज्ञ रचाया
मन्त्र भी पढ़े सभी
शाप न छूटा।
841
जलती रही
समिधा बन नारी
राख ही बची ।
942
छूटे तो छूटे
चाहे प्राण अपने !
हाथ न छूटे।
1043
सिन्धु तरेंगें
विश्वास की है नैया

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