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"देश के हर धर्म, भाषा, जाति, जन से प्यार है / 'सज्जन' धर्मेन्द्र" के अवतरणों में अंतर
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देश के हर धर्म, भाषा, जाति, जन से प्यार है। | देश के हर धर्म, भाषा, जाति, जन से प्यार है। | ||
− | + | जिस के दिल में भाव ये आया न, वो गद्दार है। | |
है अगर हीरा तुम्हारे पास तो कोशिश करो, | है अगर हीरा तुम्हारे पास तो कोशिश करो, | ||
काँच केवल पत्थरों से छाँटना बेकार है। | काँच केवल पत्थरों से छाँटना बेकार है। | ||
− | + | सीख लो सब तैरना दरिया ने लोगों से कहा, | |
− | + | ना-ख़ुदा अब छोड़ता सब को यहाँ मँझधार है। | |
हो गए इतने विषैले हों अमर इस चाह में, | हो गए इतने विषैले हों अमर इस चाह में, | ||
− | कोबरा को मार सकती अब हमारी लार है। | + | कोबरा को मार सकती अब हमारी लार है। |
देश की मिट्टी थी खाई मैंने बचपन में कभी, | देश की मिट्टी थी खाई मैंने बचपन में कभी, | ||
आज वो बनकर लहू मुझको रही ललकार है। | आज वो बनकर लहू मुझको रही ललकार है। | ||
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12:33, 26 फ़रवरी 2024 के समय का अवतरण
देश के हर धर्म, भाषा, जाति, जन से प्यार है।
जिस के दिल में भाव ये आया न, वो गद्दार है।
है अगर हीरा तुम्हारे पास तो कोशिश करो,
काँच केवल पत्थरों से छाँटना बेकार है।
सीख लो सब तैरना दरिया ने लोगों से कहा,
ना-ख़ुदा अब छोड़ता सब को यहाँ मँझधार है।
हो गए इतने विषैले हों अमर इस चाह में,
कोबरा को मार सकती अब हमारी लार है।
देश की मिट्टी थी खाई मैंने बचपन में कभी,
आज वो बनकर लहू मुझको रही ललकार है।