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"कुछ शब्द बोए थे / रश्मि विभा त्रिपाठी" के अवतरणों में अंतर

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जब बीज बोए
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तैयार करने को फसल
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दिया था जब खाद- पानी
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तो गेहूँ की सोने- सी बालियों की
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उसे ऐसी ही हुई थी प्रतीति,
  
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मैं नहीं जानती मेरी भविता
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मेरे अतृप्त जीवन ने तो
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बंजर पड़ी जमीन पर
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अभी- अभी कुछ शब्द बोए थे
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भावों की खाद डालकर
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कल्पवृक्ष- सी
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वहाँ उग आई कविता।
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और ऐसा लगा
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मुझको जो चाहिए
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मेरे कहने से पहले
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पलभर में वो सबकुछ लाकर
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मेरे हाथ पर रखने आ गए पिता।
 
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20:43, 21 नवम्बर 2024 के समय का अवतरण

जैसे अभाव के अँधेरे में
हो सविता!
खेतों में किसान ने
जब बीज बोए
तैयार करने को फसल
दिया था जब खाद- पानी
तो गेहूँ की सोने- सी बालियों की
चमक में
उसे ऐसी ही हुई थी प्रतीति,

मैं नहीं जानती मेरी भविता
मेरे अतृप्त जीवन ने तो
मन की
बंजर पड़ी जमीन पर
अभी- अभी कुछ शब्द बोए थे
भावों की खाद डालकर
अनुभूति के पानी से सींचा ही था
कि देखा-
कल्पवृक्ष- सी
वहाँ उग आई कविता।

और ऐसा लगा
मुझको जो चाहिए
जीने के लिए
मेरे कहने से पहले
पलभर में वो सबकुछ लाकर
मेरे हाथ पर रखने आ गए पिता।