भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

Changes

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

पवाड़ा / तुलसी रमण

2 bytes removed, 08:04, 15 जनवरी 2009
आओ चले उस गाँव
जहाँ झड़ते अनायास
पके फ़ल फल - डाल-डाल छाँव- छाँव चलो जीएं जीयें उस पेड़ की छाँव
जिसका वह एक फल
‘झाँणों- मनसा’ ने
चखा था आधा-अधा आधा
रह गए थे देखते
छूट गया था बीज
बीज -दर –बीज
उगते रहे किनते ही शाखी
झडते झड़ते रहे कितने फ़लफल
स्तब्ध रहा पहाड़ों का
परस्पर टकराना
थक गया
गाँव से गाँव सुलगना
गूँजता रहा‘पवाड़ा’हर रहा ‘पवाड़ा’ हर घाटी,गाँव-गाँव
काया हो जाओ
तुम उस फ़ल फल की
बीज हो जाता हूँ मैं
और उगते रहें बार-बार
घाटी-घाटी गाँव- गाँव
</poem>