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"शायरे-इमरोज़ / सीमाब अकबराबादी" के अवतरणों में अंतर

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तूने क्या मंजूम की है दास्ताने दर्दे-क़ौम?
 
तूने क्या मंजूम की है दास्ताने दर्दे-क़ौम?
  
अपने सोज़े -दिल से गरमाया है सीनों को कभी?
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अपने सोज़े-दिल से गरमाया है सीनों को कभी?
 
तर किया है आँसुओं से आस्तीनों को कभी?
 
तर किया है आँसुओं से आस्तीनों को कभी?
  

14:24, 18 जनवरी 2009 के समय का अवतरण

 
क्या है कोई शेर तेरा तर्जुमाने दर्दे-क़ौम ?
तूने क्या मंजूम की है दास्ताने दर्दे-क़ौम?

अपने सोज़े-दिल से गरमाया है सीनों को कभी?
तर किया है आँसुओं से आस्तीनों को कभी?

क़ौम के ग़म में किया है ख़ून को पानी कभी?
रहगुज़ारे-जंग में की है हुदीख़्वानी कभी?

क्या रुलाया है लहू तूने किसी मज़मून से?
नज़्में आज़ादी कभी लिक्खी है अपने ख़ून से?

रहगुज़ारे-जंग :युद्ध के मार्ग में  ; हुदीख़्वानी: बलिदानों की प्रशंसा