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20:22, 2 मार्च 2009 का अवतरण
रात इक ख्वाब हमने देखा है
फूल की पंखुड़ी को चूमा है
दिल की बस्ती पुरानी दिल्ली है
जो भी गुज़रा है उसने लूटा है
हम तो कुछ देर हंस भी लेते हैं
दिल हमेशा उदास रहता है
कोई मतलब ज़रूर होगा मियाँ
यूँ कोई कब किसी से मिलता है
तुम अगर मिल भी जाओ तो भी हमें
हश्र तक इंतिज़ार करना है
पैसा हाथों का मैल है बाबा
ज़िंदगी चार दिन का मेला है