भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

"बढे़ चलो, बढे़ चलो / सोहनलाल द्विवेदी" के अवतरणों में अंतर

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज
 
पंक्ति 1: पंक्ति 1:
[[Category:सोहनलाल द्विवेदी]]
+
{{KKGlobal}}
[[Category:कविताएँ]]
+
{{KKRachna
{{KKSandarbh
+
|रचनाकार=सोहनलाल द्विवेदी
|लेखक=सोहनलाल द्विवेदी
+
}}  
|पुस्तक=
+
|प्रकाशक=
+
|वर्ष=
+
|पृष्ठ=
+
}}
+
 
+
 
न हाथ एक शस्त्र हो,  
 
न हाथ एक शस्त्र हो,  
  

19:01, 14 अप्रैल 2009 का अवतरण

न हाथ एक शस्त्र हो,

न हाथ एक अस्त्र हो,

न अन्न वीर वस्त्र हो,

हटो नहीं, डरो नहीं, बढ़े चलो, बढ़े चलो ।


रहे समक्ष हिम-शिखर,

तुम्हारा प्रण उठे निखर,

भले ही जाए जन बिखर,

रुको नहीं, झुको नहीं, बढ़े चलो, बढ़े चलो ।


घटा घिरी अटूट हो,

अधर में कालकूट हो,

वही सुधा का घूंट हो,

जिये चलो, मरे चलो, बढ़े चलो, बढ़े चलो ।


गगन उगलता आग हो,

छिड़ा मरण का राग हो,

लहू का अपने फाग हो,

अड़ो वहीं, गड़ो वहीं, बढ़े चलो, बढ़े चलो ।


चलो नई मिसाल हो,

जलो नई मिसाल हो,

बढो़ नया कमाल हो,

झुको नही, रूको नही, बढ़े चलो, बढ़े चलो ।


अशेष रक्त तोल दो,

स्वतंत्रता का मोल दो,

कड़ी युगों की खोल दो,

डरो नही, मरो नहीं, बढ़े चलो, बढ़े चलो ।