भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
"सूर्य-ग्रहण : 3 / अरुण कमल" के अवतरणों में अंतर
Kavita Kosh से
Pratishtha (चर्चा | योगदान) |
|||
(2 सदस्यों द्वारा किये गये बीच के 3 अवतरण नहीं दर्शाए गए) | |||
पंक्ति 4: | पंक्ति 4: | ||
|संग्रह = अपनी केवल धार / अरुण कमल | |संग्रह = अपनी केवल धार / अरुण कमल | ||
}} | }} | ||
− | + | {{KKCatKavita}} | |
− | + | <poem> | |
बहुत सुन्दर लगेगा सूर्य | बहुत सुन्दर लगेगा सूर्य | ||
− | |||
धीरे-धीरे गिरेगा प्रकाश | धीरे-धीरे गिरेगा प्रकाश | ||
− | |||
और अन्त में रह जाएगी एक काली पुतली | और अन्त में रह जाएगी एक काली पुतली | ||
− | |||
रोशनी के वर्क़ में लिपटी, | रोशनी के वर्क़ में लिपटी, | ||
− | |||
कभी बस हीरे के नग-सा दमकता सूर्य | कभी बस हीरे के नग-सा दमकता सूर्य | ||
− | |||
कभी मोतियों की माला-सा झिलमिल | कभी मोतियों की माला-सा झिलमिल | ||
− | |||
कभी गरी की एक फाँक-भर उज्ज्वल | कभी गरी की एक फाँक-भर उज्ज्वल | ||
− | |||
और एक क्षण को धरती पर बिछेगी | और एक क्षण को धरती पर बिछेगी | ||
− | |||
प्रकाश और अँधेरे से बुनी चटाई | प्रकाश और अँधेरे से बुनी चटाई | ||
− | |||
बहुत सुन्दर, बहुत भव्य है ब्रह्मांड का यह दृश्य | बहुत सुन्दर, बहुत भव्य है ब्रह्मांड का यह दृश्य | ||
− | |||
जो लूट सके सो लूट । | जो लूट सके सो लूट । | ||
− | |||
ऎसी सुन्दरता कौन काम की | ऎसी सुन्दरता कौन काम की | ||
− | |||
जिसके देखे दीदा फूटे ? | जिसके देखे दीदा फूटे ? | ||
+ | </poem> |
12:56, 5 नवम्बर 2009 के समय का अवतरण
बहुत सुन्दर लगेगा सूर्य
धीरे-धीरे गिरेगा प्रकाश
और अन्त में रह जाएगी एक काली पुतली
रोशनी के वर्क़ में लिपटी,
कभी बस हीरे के नग-सा दमकता सूर्य
कभी मोतियों की माला-सा झिलमिल
कभी गरी की एक फाँक-भर उज्ज्वल
और एक क्षण को धरती पर बिछेगी
प्रकाश और अँधेरे से बुनी चटाई
बहुत सुन्दर, बहुत भव्य है ब्रह्मांड का यह दृश्य
जो लूट सके सो लूट ।
ऎसी सुन्दरता कौन काम की
जिसके देखे दीदा फूटे ?