"जीवन के रंग / रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’" के अवतरणों में अंतर
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लगें बेहया। | लगें बेहया। | ||
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+ | टीवी क्या आया | ||
+ | धूल खाती रेडियो | ||
+ | कोने में पड़ी। | ||
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+ | जमी है झील | ||
+ | मुर्गाबी को ठंडक | ||
+ | होती न फील। | ||
+ | 94 | ||
+ | चुप है पार्क | ||
+ | बार- बार पूछता | ||
+ | कहाँ हैं बच्चे? | ||
+ | 95 | ||
+ | खिंचा सन्नाटा | ||
+ | किस विषधर ने | ||
+ | धोखे से काटा! | ||
+ | 96 | ||
+ | तुम हो मौन | ||
+ | अम्बर भी चुप है | ||
+ | चुप है पौन। | ||
+ | 97 | ||
+ | जग है झूठा | ||
+ | क्या बचा अब पास | ||
+ | विश्वास टूटा। | ||
+ | 98 | ||
+ | थके बहुत | ||
+ | कुछ आराम करें | ||
+ | कल है जाना। | ||
+ | 8/12/2024 | ||
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22:42, 15 जनवरी 2025 के समय का अवतरण
83
जीवन के रंग
पतझर के संग
साथ निभाएँ।
84
गौर या पीत
न होना भयभीत
खिली मुस्कान।
85
नियति -लेख
लिख -लिख मिटाए
तख्ती को पोते।
86
थका है तन
फिर -फिर उमगे
पागल मन।
87
आओ चलदें
पीछे भी मुसाफिऱ
उन्हें बल दें।
88
ख़ुद से बातें
ख़ुद की शिकायतें
बीती हैं रातें।
89
छूटें हैं पीछे
जिनके भी आँगन
हमने सीचे।
90
ओ मनमीत!
ढूँढते हैं तुमको
बावरे गीत।
91
लुटीं पत्तियाँ
नंग- धड़ंग पेड़
लगें बेहया।
92
टीवी क्या आया
धूल खाती रेडियो
कोने में पड़ी।
93
जमी है झील
मुर्गाबी को ठंडक
होती न फील।
94
चुप है पार्क
बार- बार पूछता
कहाँ हैं बच्चे?
95
खिंचा सन्नाटा
किस विषधर ने
धोखे से काटा!
96
तुम हो मौन
अम्बर भी चुप है
चुप है पौन।
97
जग है झूठा
क्या बचा अब पास
विश्वास टूटा।
98
थके बहुत
कुछ आराम करें
कल है जाना।
8/12/2024