भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

"तू / ओएनवी कुरुप" के अवतरणों में अंतर

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज
(नया पृष्ठ: {{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=ओएनवी कुरुप |संग्रह= }} {{KKCatKavita‎}} <Poem> यहाँ पहुँचते वस…)
(कोई अंतर नहीं)

10:44, 22 अप्रैल 2011 का अवतरण

यहाँ पहुँचते वसंत की जीभ को
तूने उखाड़ दिया और
चिडियों के चोंच से
कोई आवाज़ नहीं निकलती

तूने वसंत के सौभाग्य को
हड़प लिया
देख
अब यहाँ गंधहीन फूल खिले हैं

नदी में तैरते मछली-परिवार को
तूने तबाह कर दिया
नदी भी तेरे द्वारा तोड़े गए
दर्पण के टुकडों-सी
बिखरी पडी हैं

तू मनुष्य को धीमी गति से मरने की
गोलियाँ बेचकर
धनी बना
और अब ख़ुद दवा के इंतज़ार में है

तू साँस लेता है हवा में
और पेयजल में
मृत्यु का चारा टाँगता है
जिस टहनी पर बैठा हुआ है
उसी को ख़ुद काटता है

तू आँखें मलते उठते शहर को
विषैली-गैस का कफ़न ओढ़ाकर
हमेशा के लिए सुलाता है

अगली शताब्दी का
इंतज़ार करती काली चिडिया का
गला घोंटता है तू
निषाद ! बंद कर यह सब !

मूल मलयालम से अनुवाद : संतोष अलेक्स