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गळगचिया (53) / कन्हैया लाल सेठिया

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डोरो कयो -अरे मोत्याँ, मैं ही तो थाँने पो‘र एक ठौड करया मैं ही थाँनै गळहार बणणै रो मौको दियो, पण म्हारो तो कठैई नाँव न नोरो ?
देखै जको ही कवै ओ मोत्याँ रो हार है डोरै रो हार तो कोई को बतावे नीं !