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जब कहते हो तुम / पूजा कनुप्रिया

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जब कहते हो ये तुम
मेरी जुल्फों में क़ैद हे बादल
सुबह मुहताज हे पलकों के उठने की
आँखों में बन्द हैं
सागर नदी बरसात सब
टाँक रखे हैं जूड़े में तारे मैंने
सूरज हथेली में सजा रक्खा है
बाँध रक्खी है हवाएँ आँचल से
चाँद को छत पे बुला रक्खा हे

तुम ही तो कहते हो
मेरी मुस्कान से फूल खिल जाते हैं
डूबने लगती हे धरती भी मेरे आँसुओं में
कि अगर मैं न होती
तुम्हारे जीवन मे
तो रुकने लगती हैं साँसें
तुम्हारे सीने में

ये कहकर कहा है न तुमने
सारी सृष्टि में लय मुझसे है
तुम्हारे जीवन में गति मुझसे है
जब कहते हो ये तुम
तो बताओ मानते भी हो क्या मुझे
इतनी बड़ी शक्ति
इतना ही ज़रूरी