भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
तुम बिन यह मौसम / रवीन्द्र भ्रमर
Kavita Kosh से
अनिल जनविजय (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 02:18, 29 अप्रैल 2020 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=रवीन्द्र भ्रमर |अनुवादक= |संग्रह=...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)
तुम बिन !
यह मौसम कितना उदास लगता है —
तुम बिन !
घर पीछे तालाब
उगे हैं लाल कमल के ढेर
तुम आँखों में उग आई हो
प्रात गन्ध की बेर;
यह मौसम कितना उदास लगता है —
तुम बिन !
झर-झर हरसिंगार झरते हैं
पवन पुलक के भार
हार गूँथ लूँ, किन्तु
करूँ किस वेणी का शृँगार;
यह मौसम कितना उदास लगता है —
तुम बिन !