भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

अपने पहलू में जगह गर वो ज़रा सी देंगे / गौतम राजरिशी

Kavita Kosh से
Gautam rajrishi (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 19:10, 14 फ़रवरी 2016 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=गौतम राजरिशी |संग्रह=पाल ले इक रो...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

अपने पहलू में जगह गर वो ज़रा सी देंगे
चाँद-सूरज भी हमें झुक के सलामी देंगे

जश्न हो ख़त्म ज़रा क़त्ल का मेरे, तो फिर
चल के कुछ यार भी क़ातिल की गवाही देंगे

उनके दरबार में जिनको न जगह मिल पायी
हाँ, वही लोग सुनाने को कहानी देंगे

लब खुले गर न हमारे तो है वादा उनका
भर के झोली वो हमें सारी ख़ुदाई देंगे

आसमानों में सियासत जो चले धरती की
चाँद के नाम पे तारे भी उगाही देंगे

रख लिया जत्न से बाबा की पुरानी अचकन
और तो कुछ नहीं, ये रौब नवाबी देंगे

बस यही सोच के महफ़िल में चले आए हैं
एक-दो दाद वो ग़ज़लों पे हमारी देंगे



(युगीन काव्या, जुलाई-सितम्बर 2012)