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फिर कोई / बालस्वरूप राही
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फिर कोई चेहरा बस गया निगाहों में।
खोए हुए क्षितिज फिर उभरे
अस्तमं सूरज फिर उबरे
फिर रेशम बिछ गया कंटीली राहों में।
जब से देखी हैं वे आंखें
उग आईं कंधों पर पांखें
फिर सपने उड़ चले अदेखी चाहों में।
जहां जहां भी छुआ गया हूँ
वहां वहां हो गया नया हूँ
फिर कोई कस गया जादुई बांहों में।
प्रौढ़ वासना बनी किशोरी
फिर बलवती हुई कमज़ोरी
मोम पिघलने लगी शबनमी दाहों में।