भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

उद्बोधन / ज्योतीन्द्र प्रसाद झा 'पंकज'

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

हिन्दी शब्दों के अर्थ उपलब्ध हैं। शब्द पर डबल क्लिक करें। अन्य शब्दों पर कार्य जारी है।

जागरण-प्रात यह दिव्य अवदात बंधु,
प्रीति की वासंती कलिका खिल जाने दो।

दूर हों भेद-भाव कूटनीति कलह तय,
द्वेष की होलिका को शीघ्र जल जाने दो।

नूतन तन, नूतन मन, नवजीवन छाने दो,
ढल रही मोह-निशा मित्र, ढल जाने दो।

रोम-रोम पुलकित हो, अंग-अंग हुलसित है,
प्रभा-पूर्ण ज्योतिर्मय नव विहान आने दो।