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सागर होकर पछताये / गरिमा सक्सेना
Kavita Kosh से
अच्छे भले नदी थे लेकिन
सागर होकर पछताये हम
हमने खाली अंजुलियों को
मोती, सीपी, शंख दिये हैं
अपनी सीमाओं में रहकर
सबकी ख़ातिर रोज़ जिये हैं
सबने हममें लाकर घोला
है नित अपने अवसादों को
चंचल नदियों ने सौंपा है
आकर अपने उन्मादों को
सबका खारापन पी-पीकर
निष्ठुर खारे कहलाये हम
साहिल ने भी रोज़ हमारी
लहरों की अर्जी लौटायी
राजा जैसा कोष भरा पर
हमने नियति रंक की पाई
क्या पूनम, क्या पड़े अमावस
ज्वार हृदय में उठता रहता
प्यासों को प्यासा रखने का
दोष सदा ही हम पर लगता
मजबूरी समझा कब कोई
और नहीं समझा पाये हम