जो बहुत तरसा-तरसा कर / अज्ञेय

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जो बहुत तरसा-तरसा कर
मेघ से बरसा
हमें हरसाता हुआ,
        -माटी में रीत गया ।

आह! जो हमें सरसाता है
वह छिपा हुआ पानी है हमारा
इस जानी-पहचानी
माटी के नीचे का ।
         -रीतता नहीं
          बीतता नहीं ।

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