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विस्मृति / दिनेश कुमार शुक्ल

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मुठ्ठी की बालू-सी
छीज रहीं स्मृतियाँ,
अररा कर
फटते हैं
अतीत के कगार

झपटता आता है समय
और नोंच ले जाता है
अस्तित्व से एक ग्रास
हर बार

चली गई वाणी
चले गये
स्वाद, गंध, स्पर्श,
सन्निपात के दलदल में
धंसती है चेतना

आते हैं पुत्र आते हैं पौत्र
लाते हैं पितरों की प्रतिध्वनि
बेटियाँ लाती हैं
धुंधली-सी माँ की छवि

वह खोलना चाहता है
यादों की किताव
कांपते हैं हाथ
कांपता है चराचर
झूल गई हैं उंगलियाँ

गड्डम-गड्ड होते हैं चित्र
और अक्षर,
और रेत सी लगती है भाषा

सोचती है पत्नी
कि शायद यह पुलक
जो खेली थी
चेहरे पर अभी-अभी
जाने किन
कोमल संस्मृतियों की
छाया है-
जबकि वह
खुश हो रहा है
अक्षरों को
रेंगते हुए देख कर

चित्र में
लहराते-लहराते
डूब जाती है झील
हंसते हुए चरागाह
हंस बन जाते है,
हाथियों की तरह
उड़ जाते हैं पर्वत हवा में,
चन्द्रमा फिर
आ गिरता है
उसी की गोद में

आँखों में
कांपता है जल
कांपते हैं विम्ब,
विस्मृति में
चूर-चूर होता है
चन्द्रमा...........