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चरवाहा / नरेश अग्रवाल

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इतनी सारी भेड़ें हैं यहाँ
जिन्हें इत्मीनान से हाँक रहा है चरवाहा
और जमीन समतल नहीं, कहीं पर भी
या तो चढ़ना है या तो उतरना।
हल्की-हल्की धूप पेड़ों के घेरे से
भीतर प्रवेश करती हुई
जिसमें सुनहरी नजर आती है
भेड़ों की खाल बालों से भरी-भरी
वे दौड़ती हैं इधर उधर
अपनी शोभा बिखेरती हुई।
जल्दी ही सर्दियाँ खत्म होने को हैं
गरमी से हल्के-हल्के पीले हो रहे हैं पत्ते
कुछ ही दिनों में ये सुनहरे बाल काट दिए जाएँगें
जिनके ऊन से बुन रही होंगी स्वेटर
घर में बैठी औरतें
चरवाहा होगा अपनी ही जगह पर
कम से कम कपड़ों में
भेड़े भी उसी तरह
चारों तरफ से आती है तेज रोशनी
लेकिन घास पहले से बहुत अधिक।