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दो पोज़ / दुष्यंत कुमार

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सद्यस्नात<ref>इसी समय नहाई हुई, तुरन्त नहाकर आना</ref> तुम
जब आती हो
मुख कुन्तलों<ref>केश, बाल</ref> से ढँका रहता है
बहुत बुरे लगते हैं वे क्षण जब
राहू से चाँद ग्रसा रहता है ।

पर जब तुम
केश झटक देती हो अनायास
तारों-सी बूँदें
बिखर जाती हैं आसपास
मुक्त हो जाता है चाँद
तब बहुत भला लगता है ।

शब्दार्थ
<references/>