भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

परवाह क्यों करें / सोम ठाकुर

Kavita Kosh से
Dkspoet (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 14:48, 24 फ़रवरी 2012 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=सोम ठाकुर |संग्रह= }} {{KKCatGeet}} <poem> कल सूरज...' के साथ नया पन्ना बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

कल सूरज डूबेगा सिर्फ़ दर्द- दाहों में
कल क़ि परवाह क्या करें
आज चाँदनी भर ले अलसाई बाँहों में
कल क़ि परवाह क्या करें

शबनम होगी उदास, झुलसेंगी तितलियाँ
आई है ऐटमी खबर कोई
खुशबू के ताजमहल रहेंगे न सपनों में
रहेगा न फूल का नगर कोई
कल शायद घूमे हम सूनी दरगाहों में
कल क़ि परवाह क्या करें

सीख लिया खूब गुलाबी मन के कानों ने
चितवन क़ि सरगम पर झूमना
आता है भूल से शरारती हवाओं को
मौसम का गर्म गाल चूमना
गूँथे हुए साए बिखरा दे इन राहों में
कल क़ि परवाह क्या करें

खोल गयी दरवाजा छूअनों की बिजलियाँ
साँसों की मीठी पुरवाई का
एक ही इशारा है अंगुली चटखाने का
एक ही इशारा अंगड़ाई का
कांटें यह रात आज प्यास के गुनाहों में
कल क़ि परवाह क्या करें
कल सूरज डूबेगा सिर्फ़ दर्द-दाहों में
कल क़ि परवाह क्या करें