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सखि! आ गये नीम को बौर / अज्ञेय

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 निष्पत्ति
 सखि! आ गये नीम को बौर!
हुआ चित्रकर्मा वसन्त अवनी-तल पर सिरमौर।
आज नीम की कटुता से भी लगा टपकने मादक मधु-रस!
क्यों न फड़क फिर उठे तड़पती विह्वलता से मेरी नस-नस!
सखि! आ गये नीम को बौर!
'प्रणय-केलि का आयोजन सब करते हैं सब ठौर'-

कठिन यत्न से इसी तथ्य के प्रति मैं नयन मूँद लेती हूँ-
किन्तु जगाता पड़कुलिया का स्वर कह एकाएक, 'सखी, तू?'
सखि! आ गये नीम को बौर!
प्रिय के आगम की कब तक है बाट जोहनी और?
फैलाये पाँवड़े सिरिस ने बुन-बुन कर सौरभ के जाल-

और पलाश आरती लेने लिये खड़े हैं दीपक-थाल!
सखि! आ गये नीम को बौर!

लाहौर, 1934