भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

दाना / अरुण कमल

Kavita Kosh से
अनिल जनविजय (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 10:23, 10 अक्टूबर 2007 का अवतरण (New page: {{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=अरुण कमल |संग्रह=पुतली में संसार / अरुण कमल }} वह स्त्री ...)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

वह स्त्री फँटक रही है गेहूँ

दोनों हाथ सूप को उठाते-गिराते

हथेलियों की थाप-थाप्प

और अन्न की झनकार

स्तनों का उठना-गिरना लगातार--

घुटनों तक साड़ी समेटे वह स्त्री

जो ख़ुद एक दाना है गेहूँ का--

धूर उड़ रही है केश उड़ रहे हैं

यह धूप यह हवा यह ठहरा आसमान

बस एक सुख है बस एक शान्ति

बस एक थाप एक झनकार ।