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मयंक - 1 / अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

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टूटते रहते हो, तो क्या,
क्या हुआ घटने-बढ़ने से;
मान किसने इतना पाया
किसी के सिर पर चढ़ने से।
घूमते हो अँधियारे में,
तुम्हें रजनीचर कहते हैं;
पर बता दो यह, किसका मुँह
लोग तकते ही रहते हैं।
कलंकी तुम्हें लोग कह लें,
तुम्हीं आँखों में बसते हो;
भले ही हों तुम पर धब्बे,
किंतु रस तुम्हीं बरसते हो।
किसे वह मुग्ध नहीं करता,
पास जिसके मधु-धारा हो;
सुधाकर तुम कहलाते हो,
क्यों न विष बंधु तुम्हारा हो।
मोहता ही रहता है जो,
किस तरह मन उससे फेरें?
घूमते तुम हो आँखों में,
भले ही घन तुमको घेरें।
सदा चक्कर में रहते हो,
दिवस में हो मलीन बनते;
पर तुम्हीं अवनी-मंडल पर
ज्योति का हो वितान तनते।
दिव्यता किसकी अवलोके
तरंगित तोयधि दिखलाया;
राहु कवलित कर ले, तो क्या?
कौन राका-पति कहलाया?
रचा किसने रवि-किरणें ले
चाँदनी का मंजुलतम तन;
लोग दोषकर बतलावें,
पर तुम्हीं हो रजनी-रंजन।