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गीता-गौरव / अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

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है परम-दिव्य-ज्योति-संभूत,
वेद-आभा से आभावान;
उपनिषद् का कमनीय विकास,
विविध आगम-निधि-रत्न महान।
मनुजता-मंदिर-रत्न-प्रदीप,
चारु-चिंतन-नभ-रुचिर-मयंक;
कल्पना-कलिका-कांत-प्रभात,
भारती-भव्य-भाल का अंक।
है अखिल-अवनी-तल-तम-काल,
उसी से है आलोकित लोक;
ज्ञान-लोचन का है सर्वस्व;
अलौकिकतम गीता-आलोक।