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बीते बरस की याद का पैकर उतार दे / प्रेम कुमार नज़र

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बीते बरस की याद का पैकर उतार दे
दीवार से पुराना कलंडर उतार दे

रख दी है उस ने खोल के ख़ुद जिस्म की किताब
सादा वरक़ पे ले कोई मंज़र उतार दे

भीगा हुआ लिबास बदन भी जलाएगा
उस से कहो कि सर से वो गागर उतार दे

दोनों में एक तो मिलें सुख की साअतें
ला अपना बोझ भी मिरे सर पर उतार दे

फिर क्या करोगे है तो उसी का बना हुआ
कह दे अगर वो लाया स्वटेर उतार दे

यूँ झुनझुना के टूटता तारा बिखर गया
जैसे उरूस-ए-शब कोई ज़ेवर उतार दे

चाहे है जान ओ माल की जो ख़ैरियत ‘नज़र’
शहर-ए-हवस से दूर ही लश्कर उतार दे