भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

झीनी चादर / गुलाब सिंह

Kavita Kosh से
Dkspoet (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 17:46, 4 जनवरी 2014 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=गुलाब सिंह |संग्रह=बाँस-वन और बाँ...' के साथ नया पन्ना बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

झीनी चादर हुए मेघ
कालीन हुए सीवान
क्वार दूध में भीगा
श्वेत हँसी-से फूले धान।

कल हँसिये की धार
गीत की धार बनी गूँजेगी
माँ का आँचल पकड़ प्यार से
फिर पूनम पूछेगी--

सूद-मूल के खेल
कहाँ तक झेलेंगे खलिहान?

फूली कास हिले रूमालों-सी
दे रही विदाई
पावस गई ताल में खोई
सुरधनु की परछाईं

गीली मिट्टी पकी
बरेजों में गदराये पान।

बाँझिन गाय द्वार पर
बैठी-बैठी करे जुगाली,
हरी मिर्च सूखी रोटी पर
हरी-भरी खुशहाली,

गाँव कि जैसे खुले पड़े हैं--
‘कफ़न’ और ‘गोदान’।