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हार न अपनी मानूँगा / गोपालदास "नीरज"
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हार न अपनी मानूँगा मैं!
चाहे पथ में शूल बिछाओ,
चाहे ज्वालामुखी बसाओ,
किन्तु मुझे अब जाना ही है-
तलवारों की धारों पर भी हँस कर पैर बढ़ा लूँगा मैं।
हार न अपनी मानूँगा मैं!
मन में मरु-सी प्यास जगाओ,
रस की बूंद नहीं बरसाओ,
किन्तु मुझे जब जीना ही है-
मसल-मसल कर उर के छाले, अपनी प्यास बुझा लूँगा मैं।
हार न अपनी मानूँगा मैं!
चाहे चिर गायन सो जाए,
और हृदय मुर्दा हो जाए,
किन्तु मुझे जब गाना ही है-
बैठ चिता की छाती पर भी, मादक गीत सुना लूँगा मैं।
हार न अपनी मानूँगा मैं!