भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

घर नीं मकान / मधु आचार्य 'आशावादी'

Kavita Kosh से
आशिष पुरोहित (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 15:53, 28 जून 2017 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=मधु आचार्य 'आशावादी' |अनुवादक= |संग...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

गवाड़ रा मानीता मिनख
उणां रो घर
पैलड़ै साल अेक भींत घली
कीं माण घटयो
आगलै साल दूजी भींत
लोगां मांय सरू हुई
खुसर -फुसर
तीजै साल फेरूं अेक भींत
अबै लोग बाता करण लागग्या
की ंसाची अर कीं गोडै घड़ी
चौथो साल आयो
घर मांय हाका ई हाका
अेक भींत और घालीजगी
लोगां बाबोसा नै
मूंडै माथै सुणावणो सरू कर दियो
मोटो घर, चार भींतां !
अबै लोगां उणनै
घर नीं
मकान कैवणौ सरू कर दियो।