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प्रीत मेरी आज क्यों वैरागिनी-सी / अमरेन्द्र

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प्रीत मेरी आज क्यों वैरागिनी-सी।

रातरानी खिल गई, मधुभावना ले
है सुवासित मलय भी, सौ कामना ले
आज क्यों न मेघ लगते नेत्रा-अंजन
और जल की धार सुन्दर रागिनी-सी।

क्यों न हरशृंगार की साँसे लुभातीं
क्यों ये किरणें दिवस की मुझको डरातीं
क्यों न लगती यह हवा, यह रात शीतल
जब लगी तो, बस लगी हतभागिनी-सी।

जी रहा हूँ शून्यता के छोर पर मैं
एक टूटी कामना के जोर पर मैं
गा रहा हूँ राग, गौरी, भोर-वेला
गन्ध-चन्दन की उठी दावाग्नि-सी।

पूर्णिमा की रात लगती है चिता-सी
जल उठे हैं भाव मन के सब पलासी
मन तो करता, राग जैजैवन्ती गाऊँ
काल की गति चल रही पर व्यालिनी-सी।