भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
हम गयन याक दिन लखनउवै / रमई काका
Kavita Kosh से
अनिल जनविजय (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 15:37, 24 अगस्त 2017 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=रमई काका |संग्रह= }} {{KKCatKavita}} <poem> हम गय...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)
हम गयन याक दिन लखनउवै,
कक्कू संजोगु अइस परिगा।
पहिलेहे पहिल हम सहरु दीख,
सो कहूँ – कहूँ ध्वाखा होइगा —
जब गएँ नुमाइस द्याखै हम,
जंह कक्कू भारी रहै भीर।
दुई तोला चारि रुपइया कै,
हम बेसहा सोने कै जंजीर।।
लखि भईं घरैतिन गलगल बहु,
मुल चारि दिनन मा रंग बदला।
उन कहा कि पीतरि लै आयौ,
हम कहा बड़ा ध्वाखा होइगा।।