भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

अंगिका मुकरियाँ-6 / सुधीर कुमार 'प्रोग्रामर'

Kavita Kosh से
Rahul Shivay (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 14:42, 16 सितम्बर 2017 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=सुधीर कुमार 'प्रोग्रामर' |अनुवादक...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

बित्ता भर माँटी मेॅ घुसलोॅ,
जरियो टा नै लागै रूसलोॅ।
माटी के पुस्तैनी जेरा,
की सखि दीमक? नै सखि चेरा।

झूठ-साँच के सानी-सानी,
हर पन्ना पर लाख कहानी।
टेबुल पर करसारी बीबी,
की हिय किताब? नै पिय टीबी।

घोॅर-दुआर सुहानोॅ लागै,
सबसें पहिनें सूतै-जागै।
हुनको हिस्सा छोटोॅ कूड़ी,
की सखि नौड़ी? नै सखि बूढ़ी।

चौड़ा रस्ता सात सहेली,
आगू-पीछू ठेलम-ठेली।
परसासन के नींद हराम,
की सखि जलूस? नै सखि जाम।

झुकलोॅ कम्मर धँसलोॅ छाती,
झलकै हड्डी के सब बाती।
जमराज्हौ केॅ लागै कूड़ा,
की हिय रोगी? नै पिय बूढ़ा।

दूध पिलाबै लोरी गाबै,
गोदना पारी ओम लिखाबै।
घुरी-पिफरी हुलकै मुस्काय,
की हिय दादी? नै पिय माय।