भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

पृथ्वी — 3 / तेजी ग्रोवर

Kavita Kosh से
अनिल जनविजय (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 01:55, 20 नवम्बर 2017 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=तेजी ग्रोवर |अनुवादक= |संग्रह=अन्...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

पहाड़ियाँ अपने घरों के साथ डूबती हैं नदी में जहाँ उनके
अक़्स हैं।

वे सब अपने अक़्सों की बस्तियों में ही जल-मग्न होंगे।
उनका दुख भी कुछ देर अनुगूँज की तरह सुनाई देगा।

पृथ्वी सिर्फ़ एक नदी होगी, ख़ाली नौकाओं के साथ वैसे
ही धीेमे-धीमे घूमती हुई।