भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

डाकिया की माँ / सैयद शहरोज़ क़मर

Kavita Kosh से
अनिल जनविजय (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 14:15, 27 दिसम्बर 2017 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार= सैयद शहरोज़ क़मर |अनुवादक= |संग्र...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

गली-नुक्कड़,चौक-गलियारा
सीढ़ी-ज़ीना, खिड़की दरवाज़ा
हर्ष-विषाद की सूचनाएँ
अन्तड़ियों के गर्भ से खीम्ची गई
ताक़त से मारागयापैडल
'सूमो' को पीछे करने की
ख़ुशफ़हमी में ज़ंग-आलूद रीम पर
घिसटता पहिया

कई गुना तेज़ी से माँ
सुई में धागे पिरो रही है
शाह जलील<ref>काको, जहाँनाबाद के सूफ़ी सन्त, कवि की माँ के दादा</ref> की तावीज़
मोम व कपड़े में लपेटने की कोशिश में
ताकि जल्द-अज़-जल्द
बेटे तक भेज सके
 
07.08.1997

शब्दार्थ
<references/>