भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

ऋतु जलसे की / कुमार रवींद्र

Kavita Kosh से
Pratishtha (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 01:40, 10 जुलाई 2008 का अवतरण (New page: {{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=कुमार रवींद्र }} Category:गीत ऋतु जलसे की महानगर में नदी-क...)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

ऋतु जलसे की

महानगर में

नदी-किनारे जंगल काँपा


पिछली बार कटे थे महुआ

अबकी जामुन की बारी है

पगडंडी पर

राजा जी के आने की सब तैयारी है


आगे बडे मुसाहिब

उनने

जंगल का हर कोना नापा


बेल चढी है जो बरगद पर

आडे आती है वह रथ के

हर झाडी काटी जायेगी

दोनों ओर उगी जो पथ के


आते हैं हर बरस

शाह जी

नदी सिराने महापुजापा


उधर मडैया जो जोगी की

उसमें रानी रात बसेंगी

वनदेवी का सत लेकर वे

अपना कायाकल्प करेंगी


महलों में

बज रहे बधावे

जंगल ने डर कर मुँह ढाँपा।