भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
अन्तर्दाह / पृष्ठ 23 / रामेश्वर नाथ मिश्र 'अनुरोध'
Kavita Kosh से
सशुल्क योगदानकर्ता ४ (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 14:11, 13 फ़रवरी 2019 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=रामेश्वर नाथ मिश्र 'अनुरोध' |अनुव...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)
उड़ती ज्यों नील गगन में
जलयुक्त तमस की ढेरी
वैसे इस व्यथित हृदय से
उड़ती प्रत्याशा तेरी ।।१११।।
व्याकुल लहरों को थपकी
दे - दे जब पुलिन सुलाता
तब हृदय व्यथा चुपके से
कोई कुरेदने आता ।।११२।।
जब मैं सोता रहता हूँ
सुख - सपनों के आंगन में
तब कौन हृदय में आ कर
हलचल भर देता मन में ।।११३।।
मेरे मानस की करुणा
रोती उर के कोने में
क्या कहूँ कि क्या सुख मिलता
भीतर - भीतर रोने में ।।११४।।
युग बीत गया है कितना
हम क्या जानें अनजाने ?
इस स्वप्नमयी संसृति में
किसको हम अपना मानें? ।।११५।।