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धवल धरा / रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

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201
धवल धरा
सूरज का रथ भी
आने से डरा।
202
हिम का गर्व
कर देती है खर्व
नन्ही-सी दूब।
203
चिट्टी चादर
भोर में ही बिछाई
बैठो तो भाई।
204
संताप बड़ा
किसी का दुख पूछो-
ये पाप बड़ा।
-0-