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तारक / महेन्द्र भटनागर

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झिलमिल-झिलमिल होते तारक !
टिम-टिम कर जलते थिरक-थिरक !
कुछ आपस में, कुछ पृथक-पृथक,
बिन मंद हुए, हँस-हँस, अपलक,
कुछ टूटे पर, उत्सर्गजनक
नश्वर और अनश्वर दीपक।
बिन लुप्त हुए नव-ऊषा तक
रजनी के सहचर, चिर-सेवक !
देखा करते जिसको इकटक,
छिपते दिखलाकर तीव्र चमक !
जग को दे जाते चरणोदक
इठला-इठला, क्षण छलक-छलक !
झिलमिल-झिलमिल होते तारक !