इन्क़लाब हूँ साहिब / नमन दत्त

सशुल्क योगदानकर्ता ५ (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 23:11, 24 मई 2020 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=नमन दत्त |अनुवादक= |संग्रह= }} {{KKCatKavita}}...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)

अल्ग़रज़ इन्क़लाब हूँ साहिब।
मैं ख़ुद अपना जवाब हूँ साहिब॥

अपनी ही आग में जो जलता रहा,
मैं वही आफ़ताब हूँ साहिब॥

बारिशे अश्क थम गई कब की,
अब सरापा सराब हूँ साहिब॥

जिसकी ताबीर जुस्तजू है फ़क़त,
मैं वह मुफ़लिस का ख्व़ाब हूँ साहिब॥

जिसकी क़ीमत लगानी मुश्किल है,
वो पुरानी शराब हूँ साहिब॥

ज़र्द चेहरे की सिलवटें पढ़िये,
ज़िन्दगी की किताब हूँ साहिब॥

इस पृष्ठ को बेहतर बनाने में मदद करें!

Keep track of this page and all changes to it.