भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

प्रीत की अल्पनाएं / लावण्या शाह

Kavita Kosh से
Arti Singh (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 21:22, 9 अगस्त 2020 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=लावण्या शाह |अनुवादक= |संग्रह= }}{{KKCatK...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

प्रीत की अल्पनाएं सजी हैं प्रिये !
 आ भी जाओ प्रिये, आ भी जाओ!
मौन मुखरित करो फ़िर कहूंगा तुम्हें
 आ भी जाओ हां आ जाओ प्रिये !

ले कर कुमकुम का लाल रंग
लिए काजल सा काला रंग
नीले नभ सा ले नीला रंग
हरी दूब से चुरा कर हरा रंग

सिंदूरी संध्या सा स्वर्णिम
शुक्र तारक सा हीरक कण
जामुन से लेकर जामुनी भी
केसरिया, गुलाबी, धानी भी
नव-रंग नव-रस नव-उमंग है।

कल्पनाओं सी सजी अल्पनाएँ हैं
प्रीत के रंग तुम जी भर के देखो प्रिये
प्रीत की अलपनाएं सजी हैं प्रिये !