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एक दिन / विजय सिंह नाहटा

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एक दिन
कविता में खिला
सुबह के ताज़ा तरीन फूल-सा
और झूमता रहा
जन्म-जन्मांतर
अक्षय ताज़गी से सराबोर।
प्रिय!
तुम्हें देता हूँ यह आदिम गुलाब
जिस पर अंकित शिल्प अमरता का
इस धरती पर तुम्हारा यूं निर्भय टहलना
कमतर नहीं एक विराट दिग्विजय से
दिगंत तक फैला वैभव: इस एक महान क्षण का
तमाम नश्वरताओं के संधि-पत्र पर
ज्यों अंकित;
अमिट हस्ताक्षर
अथाह प्रेम के।